सरदार गब्बर सिंह वर्ष 2012 में पवन कल्याण की फिल्म “गब्बर सिंह” का सीक्वल हैं| साउथ के तेलुगू सुपरस्टार पवन कल्याण की यह पहली हिंदी फिल्म है| इस एक्शन-मसाला फिल्म का निर्देशन के. एस. रविन्द्र ने किया हैं| इस फिल्म में पवन कल्याण, काजल अग्रवाल और शरद केलकर ने मुख्य भूमिकाये अदा की हैं| इस फिल्म को तेलुगू में निर्मित किया गया है और हिंदी डब संस्करण के साथ भी रिलीज़ किया गया हैं|
हिंदी भाषी दर्शकों ने टीवी पर पवन कल्याण की मास मसाला फिल्मों का काफी एन्जॉय किया हैं, पहली बार उनको बड़े परदे में उनके पसंदीदा साउथ स्टार की फिल्म देखने का मौका मिल रहा हैं| जिस तरह से हॉलीवुड में “एक्शन सुपरहीरो फिल्म” बनती है ठीक वैसे ही साउथ की प्रचलित शैली में “एक्शन स्टार फिल्मों” का चलन हैं, जिनको अपने यहाँ के निर्देशक और निर्माता हिंदी में भी बना डालते हैं|

Sardaar Gabbar Singh Movie Review 2016

Pawan Kalyan & Kajal Aggarwal Starrer Sardaar Gabbar Singh (2016) Film

यह अनाथ गब्बर की कहानी हैं, जिसको “शोले” फिल्म का “जो डर गया, समझो वो मर गया” डायलॉग वाला गब्बर सिंह पसंद हैं| यह सवांद उसका प्रिय और उसके जीवन का आदर्श वाक्य होने के साथ वह निडर है और चूँकि वो गब्बर सिंह का फेन है तो अपना नाम गब्बर रख लेता हैं| एक पुलिस अधिकारी उसको लालन-पालन करता है उसको अपनी तरह पुलिस की नौकरी दिलवा देता हैं| निडर, बहादुर और ईमानदार सरदार गब्बर सिंह (पवन कल्याण) से अपराधी खौफ खाते हैं| उसका तबादला रतनपुर किया जाता है, वहां का एक ठेकेदार भैरों सिंह (शरद केलकर) वहां के गरीब किसानों की ज़मीन हडपने के अलावा वहां के स्थानीय राजा की बेटी अर्शी (काजल अग्रवाल) और उसकी जायदाद पाना चाहता हैं| पुरे गाँव में भैरों सिंह और उसके गुंडों का राज चलता है, कानून-व्यवस्था की कोई जगह नहीं, सभी गाँववासी भैरों सिंह के भय में अपना जीवन गुज़र रहे होते हैं|

गब्बर और ठेकेदार के बीच के संघर्ष और सरदार गब्बर सिंह की प्रेम कहानी की इस फिल्म में भारी मात्रा में एक्शन के साथ-2 भरपूर नाच-गाने हैं| फिल्म की पूरी कहानी और उसके क्लाइमेक्स के लिए आपको नजदीकी सिनेमाघरों तक जाकर फिल्म को देखना होगा|

Sardaar Gabbar Singh (2016) Movie Review & Rating

Vella Di Rating: 5.5/10

पवन कल्याण को एक्शन किंग माना जाता है और साउथ की फिल्मों की शैली जैसी सबको पता है कि सुपरस्टार के अलावा किसी और किरदार को ज्यादा तवज्जो नहीं दी जाती वो सिर्फ खानापूर्ति के लिए ही रखे जाते हैं| ठीक वैसे ही यह फिल्म पूरी तरह से पवन कल्याण के लिए है, इसको वन मैन शो कहा जा सकता हैं| फिल्म में काजल अग्रवाल काफी डिसेंट लगी है और अपने किरदार को ईमानदारी से अदा किया हैं|
ब्रह्मानंदम और पृध्विराज ने कई रीलों को बर्बाद किया है| फिल्म में बतोर खलनायक शरत केलकर और प्रदीप रावल काफी साधारण हैं।

के. एस. रवीन्द्र का निर्देशन कोई खास प्रभावित नहीं कर पाया, फिल्म में इंटरवल के बाद सरदार संगीत के अलावा कोई इनोवेटिव सीन्स नहीं हैं| फिल्म में काफी दर्शय अतार्किक और अचानक दिखाई देते हैं| स्पष्टता की कमी साफ़ देखी जा सकती है उसके अलावा लीड सीन्स स्थापित करने में भी नाकामयाब रहे हैं| फिल्म की कहानी कुछ खास नहीं हैं, वही पुराना घिसा-पिटा फार्मूला बोरियत के साथ दर्शकों को परोसा गया हैं|

फिल्म को सिर्फ पवन कल्याण के शक्तिशाली संवाद अदायगी, कुछ अच्छे गाने वो भी सिर्फ तेलुगू वर्शन के लिए, क्यूंकि हिंदी में उनकी डबिंग तो सभी जानते है कुछ खास नहीं रहती और कुछ बीच-बीच में आने वाले मनोरंजक एपिसोड के लिए इस फिल्म को देखा जा सकता हैं|

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