Pink (2016) Movie Review: “ना” सिर्फ एक ‘शब्द’ नहीं है, एक पूरा वाक्य है अपने आप में…!

पिंक एक भारतीय कोर्टरूम ड्रामा फिल्म है, जिसका निर्देशन अनिरुध रॉय चौधरी ने और निर्माण रश्मि शर्मा और शूजीत सरकार ने किया है, जबकि लेखन का काम रितेश शाह ने संभाला है| अरशद वारसी और बोमन ईरानी अभिनीत जॉली एल एल बी के बाद ये दूसरी फिल्म है, जिसमें कोर्ट रूम ड्रामा असल जिंदगी में जैसा होता है, वैसा दिखाया गया है|

Courtroom Drama Pink (2016) Film Story/Plot

फिल्म की कहानी दिल्ली के पॉश इलाके में किराये से रहने वाली तीन कामकाजी लडकियों मिनल अरोरा (Taapsee Pannu), फलक अली (Kirti Kulhari) और एंड्रिया (Andrea Tariang) के साथ-साथ उन चार लड़कों की भी कहानी है, जो फिल्म की केंद्रीय घटना में शामिल हैं। हालांकि उनके चरित्र के विस्तार में लेखक नहीं जाते, मगर उनके बहाने पुरुष-प्रधान समाज की सामंती सोच सामने आती है। मिनल दिल्ली के करोलबाग, फलक लखनऊ और एंड्रिया मेघालय से है जिसे सभी नार्थ-ईस्ट की लड़की कहते है|

बहरहाल, एक रात रॉक शो के बाद तीनों राजवीर (Angad Bedi) और उसके दोस्तों की और से सूरजकुंड के एक रिसोर्ट में डिनर का आमंत्रण स्वीकार कर लेती है, लेकिन कुछ ड्रिंक्स के बाद एंड्रिया महसूस करती है डम्पी (Raashul Tandon) उसे गलत तरीके से छुने की कोशिश करता है और ताकत के नशे में चुर राजवीर मिनल के ऐतराज के बावजूद उससे छेड़खानी की कोशिश करता है|

Pink Movie Review 2016

इसी बीच में बचाव में मीनल एक बोतल से राजवीर पर हमला कर देती है, जिस से उसकी आँख में लगती है और खून बहने लगता है| तीनों लडकियाँ इस उम्मीद के साथ घर लौट आती है कि बात आई गई हो गयी|

लेकिन इसके बाद उनकी जिंदगी दूभर हो जाती है, जब वो युवक उन लडकियों को बदनाम करने और डराने की कोशिश करते है| छेड़खानी की कोशिश करने वाला राजवीर अपने ताकतवर तालुकात का इस्तेमाल करके उनके खिलाफ वेश्यावृत्ति और जान से मारने का आरोप लगाते हुए एफआईआर दर्ज करवा देता है| इसके बाद तीनों को फरार होना पड़ता है और मुश्किलों के दौर की शुरुआत होती है|

मामला कोर्ट में पहुंचता है| बहुत सारे ट्विस्ट और टर्न्स शुरू हो जाते हैं, कहानी और दिलचस्प तब बनती है जब इसमें वकील दीपक सहगल (Amitabh Bachchan) की एंट्री होती है, जो खुद बाइपोलर डिसऑर्डर का शिकार है, लड़कियों का केस लड़ता है। फिल्म में असली ड्रामे की शुरुआत यहीं से शुरू होती है।

कोर्ट रूम में वाद-विवाद के बीच कई सारे खुलासे होते हैं और अंततः क्या होता है, इसे जानने के लिए आपको अपने नजदीकी सिनेमाघरों में पॉपकॉर्न और कॉफ़ी का मज़ा लेते हुए फिल्म देखनी पड़ेगी|

Pink Movie Review and Rating

Vella Di Rating: 8.4/10

पिंक मूवी उस पुरुषवादी मानसिकता के खिलाफ एक कड़ा संदेश देती है, जिसमें पुरुष और महिला को अलग-2 पैमानों पर रखा जाता है| लड़के-लडकियों के प्रति समाज में प्रचलित मान्यताओं और धारणाओं की असामनता और पाखंड को उजागर करती है| फिल्म के संवादों और द्र्श्यो से अहसास होता है समाज जिसे उचित और सामान्य मानता है, दरअसल वह आदत में शुमार पाखंडी और पिछड़ी तुच्छ सोच है|

इस फिल्म की कहानी बताती की यदि कोई पुरुष ताकतवर परिवार से होता है तो किस तरह पीड़ित महिला के लिए न्याय की लड़ाई लड़ना कठिन हो जाता है| कहानी थोड़ी बहुत “नो वन किल्ड जेसिका” और थोड़े बदले संदर्भ में “दामिनी” जैसी लगती है|

मूवी समाज की उस घटिया सोच पर भी सवाल खड़े करती है, जो लडकियों के जींस-टीशर्ट पहनने, पार्टियों में जाने, हंसकर और छूकर बातें करने, डिस्को जाने, सिगरेट और शराब पीने से लडकियों के किरदारों पर प्रशनचिन्ह क्यों लगते है? जबकि वही लड़का यही सब करता है तो उस पर कोई बात तक नहीं उठती|

लड़कियां यह सब करती हैं तो उनके चरित्र को खराब मान लिया जाता है और पुरुष यह अनुमान लगा लेते है कि वो उनके साथ हमबिस्तर भी हो सकती है| पुरुषवादी समाज ने लडकियों पर पाबंदी लगा रखी है, अगर वे पुरूषों की रुढ़िवादी सोच से बाहर निकलती है तो उन्हें बदलचलन कहा और समझा जाता है|

कोर्टरूम में सुनवाई के दौरान मीनल से उसकी ड्रिंकिंग हैबिट्स और वर्जिनिटी पर प्रश्न किये जाते है, इन सवालों के जरिये यह दिखाने की कोशिश की गयी है, समाज के मापदंड कैसे लड़के और लडकियों के लिए अलग होते है| कोर्टरूम के प्रश्न-उत्तर जोनाथन काप्लन की ड्रामा फिल्म ‘द एक्यूज्ड’ से प्रभावित हैं।

फिल्म में लडकियों के लिए चार सुरक्षा नियम भी बताये गए है जिसमें बताया जाता है कि किसी लड़की को किसी लड़के के साथ क्या-2 नहीं करना चाहिए| इस फिल्म का सारा द्वंद एक “ना” पर है|

“ना” सिर्फ एक शब्द नहीं है, बल्कि यह एक पूरा वाक्य है अपने आप में….जिसको किसी व्याख्या की जरुरत नहीं है| नो मतलब नो…… फिल्म में सबसे बढ़िया संदेश यही दिया गया है कि भले ही कोई महिला आपकी प्रेमिका, दोस्त, परिचित, सेक्स वर्कर या बीवी ही क्यूँ ना हो यदि वह “ना” कहती है तो किसी भी पुरुष को उसको छुने और जबरदस्ती करने का अधिकार नहीं है|

नॉर्थ ईस्ट के रहनेवालों को आज भी अपने ही देश में जो जि‍ल्लत झेलनी पड़ती है, इस मुद्दे का भी जि‍क्र किया गया है|

इस फिल्म में असल जिंदगी से जुड़े वास्तविक मुद्दों को बड़ी ही संजीदगी से उठाया गया है और पूरा ड्रामा इस तरह से कड़ी में पिरोया गया है कि कही भी यह भाषण नहीं लगता है और यही इस फिल्म की सबसे बड़ी ताकत है|

इस फिल्म को लिखा है रितेश शाह (Ritesh Shah) ने जिन्होंने इससे पहले एयरलिफ्ट (2016), मदारी (2016), डी-डे (2013) और कहानी (2012) जैसी कामयाब फिल्मों के लेखन का जिम्मा संभाला हैं| इस फिल्म की कहानी और पठकथा रितेश ने बहुत ही सरल लेकिन सोचने पर मजबूर होने वाली लिखी है, फिल्म की कहानी जैसे-जैसे आगे बढती है, दर्शक स्वत ही उससे कनेक्ट करने लगता है| कोर्ट रूम ड्रामा में प्रयोग किये गए शब्दों से लगता है, लिखने से पहले काफी रिसर्च किया गया है| संवाद और किरदारों का चित्रण भी बखूबी किया गया है|

अमिताभ बच्चन ने एक बार फिर साबित कर दिया उनको सदी का महानायक ऐसे ही नही कहा जाता है, साथ ही साथ बता दिया उम्र का अभिनय से कोई ताल्लुक नहीं है| अमिताभ को वकील के नए अंदाज़ में देखकर उनके अभिनय के नए पहलु से परिचित होंगे| अमिताभ ने अपने इस बाइपोलर पीड़ित किरदार में जिसका बात बात पर मूड बदल जाता है, उसे बेहद ही ईमानदारी से बड़े पर्दे पर पूरी संजीदगी से साकार किया है|

तीनों लडकियों में मीनल मुख्य है इसलिए तापसी पन्नू के पास अपनी अदाकारी दिखाने का बेहतरीन अवसर था, जिसमे उसने ज़रा सी चुक किये बिना अपनी उम्दा उदाकारी से सबको प्रभावित करने में असरदार रही है| फिल्म में कोर्ट रूम ड्रामा के दौरान उनका गुस्सा और झिझक के दर्शय लाजवाब है| कीर्ति कुलहरी भी कमाल की खोज है, उसके अलावा एंड्रिया तेरियांग अपने किरदार को बड़ी ही संजीदगी से मजबूती से पेश करती है| इन तीनों अभिनेत्रियों पर ही पूरी फिल्म का दारोमदार था, अगर ये अपना दुःख, दहशत, जिल्लत और एक दुसरे के प्रति अपनी बॉन्डिंग नहीं दर्शाती तो यह फिल्म ओंधे मुंह के बल गिरती|

राजवीर की भूमिका में अंगद बेदी उसकी ऐंठ को सही ढंग से पेश करते हें। कोर्ट रूम में वकील के रूप में पीयूष मिश्रा ने उम्दा एक्टिंग की है, संयत भाव से अपने किरदार को जिया हैं। निर्देशक ने उन्हें किरदार से छिटकने नहीं दिया है! जज के रूप में ध्रीतम चटर्जी ने दमदार अभिनय से प्रभावित किया है| बाकी सह कलाकारों का काम भी सटीक है| हरेक किरदार में कुछ न कुछ खास है, जो बांधे रखता है! छोटे-बड़े हर किरदार की सही कास्टिंग इस फिल्म को और मजबूत बनाती है|

फिल्म के निर्देशक अनिरुध रॉय चौधरी (Aniruddha Roy Chowdhury) ने पिंक फिल्म के ज़रिये हिंदी फिल्मों में अपना निर्देशन का डेब्यू किया है, इस से पहले इनको अपनी कामयाब बंगाली फिल्मों के निर्देशक के रूप में जाना जाता था, जिसमें अनुरानन (2006), अंतहीन (2008), अपराजिता तुमी (2012) और बुनो हांश (2014) प्रमुख है| फिल्म का निर्देशन लाजवाब है, विशेषकर आर्ट-डायरेक्शन काबिल-ऐ-तारीफ़ है| दिल्ली की सड़के और मोहल्ले फिल्म में एक किरदार की तरह इस्तेमाल किये गए है, वाकई में एक बार आपको लगेगा जैसे सबकुछ सच में आपके सामने हो रहा हो|

फिल्म के निर्माता शूजीत सरकार (Shoojit Sircar) के खाते में विक्की डोनर (2012), मद्रास कैफ़े (2013) और पिकू (2015) के बाद एक और बढ़िया फिल्म पिंक (2016) जुड़ गयी है|

फिल्म का संगीत दिया है शांतनु मोइत्रा (Shantanu Moitra), अनुपम रॉय (Anupam Roy) और फिजा मुजाहिद ने|  फिल्म का अवसाद और तनाव पार्श्व संगीत के प्रभाव से बहुत खूबसूरती से निर्मित होता है| फिल्म का संगीत कहानी को निखारता है और “कारी कारी” वाला गीत फिल्म में समय-समय पर आता है,जो मौके की नजाकत को दर्शाता है| इसके अलावा “जीने दे मुझे”, “पिंक” और तुझसे ही है रोशनी” गीत भी अच्छे है| फिल्म के अंत में अमिताभ की आवाज में प्रस्तुत ‘पिंक पोएम’ में फिल्म का सार और संवेदना है।

“तू खुद की खोज में निकल तू किस लिए हताश है,
तू चल तेरे वजूद की समय को भी तलाश है।”

अभिक मुखोपाध्याय (Abhik Mukhopadhyay) की सिनेमाटोग्राफी कमाल की है उनका कैमरा वर्क दिल को छु जाता है और बुधोदित्या बैनर्जी (Bodhaditya Banerjee) की एडिटिंग शानदार है, जिसमें कमी निकालना मुश्किल काम लगता है| 2 घंटे 16 मिनट की यह फिल्म हर लिहाज से बेहतर है और आपको एंटरटेन करने के साथ-साथ काफी खूबसुरती से सामाजिक संदेश देने के अलावा विसंगतियों और कुरीतियों पर सवाल खड़े करती है|

4 Comments

  1. this film is real fact this time… many girls face this situation this time because of boys dirty think and they treat that lyk but… in this movie clear one thing its NO mean NO…. not yes or may be ya in future… !!!!!!!!! NO mean Clearly NO… that’s all.

    1. Author

      आपके विचारों का स्वागत है… उच्च-स्तरीय टीका टिप्पणी के लिए शुक्रिया 🙂

  2. In This Movie Says One Word No: No Is the Complete Sentences .If Some One U Says No That Means U Don’t Force with Him. All The Corrector of this movie are Play There role very specifically. One thing in this movie Show all the real fact of life.

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